सुप्रीम कोर्ट किसानों के अहिंसक आंदोलन में दखल नहीं देगा

उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार द्वारा पास किए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के आंदोलन को समाप्त कराने का दायित्व केंद्र सरकार के ही कंधों पर वापस डाल दिया है और जब तक शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन चल रहा है, इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस रामासुब्रमणियन की पीठ ने अपने आदेश में लिखा है कि उच्चतम न्यायालय किसी भी तरह से किसानों के आंदोलन में दखल नहीं देगा। विरोध करना उनका अधिकार है, जब तक कि वो अहिंसक रहे।

केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पारित किए गए तीन नये कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के प्रदर्शन को हटाने संबंधी याचिका पर सुनवाई करने के बाद उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड आदेश में पीठ ने कहा है कि उच्चतम न्यायालय किसी भी तरह से किसानों के आंदोलन में दखल नहीं देगा।

पीठ ने कहा कि प्रदर्शन का अधिकार मूलभूत अधिकार में शामिल है, जब तक कि इससे सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न न हो। इसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता जब तक यह अहिंसक है और इससे जान और माल की कोई क्षति नहीं होती, इसलिए पीठ का विचार है कि किसानों का आंदोलन जारी रखने की अनुमति होनी चाहिए और इसमें किसानों और पुलिस की ओर से उकसाने की कोई कार्रवाई या शांति भंग नहीं होनी चाहिए। पुलिस किसी तरह की हिंसा का सहारा नहीं लेगी। किसानों का विरोध अहिंसक ढंग से चल सकता है। पीठ ने अटॉर्नी जनरल को इंगित करते हुए कहा कि आप भी हिंसा नहीं भड़का सकते।

पीठ ने कहा कि किसानों का आंदोलन तीन  नए कृषि कानूनों के खिलाफ है, जिन्हें हाल ही में लागू किया गया है। इन तीनों कानूनों के खिलाफ कोर्ट में याचिकाएं दाखिल हैं और समय से उनका निस्तारण किया जाएगा। पीठ ने कहा कि वो फिलहाल कानूनों की वैधता तय नहीं करेगी। जहां तक सरकार और किसानों के बीच वर्तमान गतिरोध है तो हम समझते हैं कि इसके समाधान के लिए कृषि विशेषज्ञों और किसान संघों के निष्पक्ष और स्वतंत्र पैनल का गठन पर किया जाए।

पीठ ने कहा कि हम कृषि कानूनों पर बने गतिरोध का समाधान करने के लिए कृषि विशेषज्ञों और किसान संघों के निष्पक्ष और स्वतंत्र समिति के गठन पर विचार कर रहे हैं, जिसके सामने दोनों पक्ष अपनी बात रख सकते हैं। पीठ ने कहा कि यह समिति समस्या का समाधान खोजेगी और इस समाधान का पालन किया जाना चाहिए। जब तक समिति की ओर से कोई समाधान नहीं आता है, तब तक आंदोलन जारी रह सकता है। इस समिति में पी साईंनाथ, भारतीय किसान यूनियन और अन्य किसान संगठनों के सदस्य हो सकते हैं।

पीठ ने कहा कि दिल्ली के रास्तों को बंद करने से शहर के लोगों के सामने खाने-पीने की समस्या आ सकती है। न्यायालय ने कहा कि समस्या का हल आपस में बातचीत से ही निकल सकता है। विरोध में केवल आंदोलन पर बैठने से समस्या दूर नहीं होगी।

पीठ ने कहा कि शीतावकाश के बाद इन याचिकाओं को सूचीबद्ध किया जाए और यदि पक्षकार चाहे तो सभी पक्षों को नोटिस देकर अवकाश पीठ के समक्ष भी इसे पेश कर सकते हैं। पीठ ने कहा कि इस बीच याचिकाकर्ता सभी पक्षों को नोटिस दे सकते हैं। पीठ ने कहा कि इस मामले के लंबित रहने के दौरान यदि पक्षकार इसे उपयुक्त समझौता करना चाहते हैं तो पीठ को कोई आपत्ति नहीं होगी।

चीफ जस्टिस बोबडे ने सुझाव दिया कि जब तक सरकार और किसानों के बीच समझौते की बात होती है तब तक इन कानूनों को लागू न किया जाए। केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि वह इस सुझाव पर सरकार से बात करेंगे और अगली सुनवाई में सरकार का रुख बताएंगे। हालांकि उन्होंने कहा कि इसकी गुंजाइश कम है, क्योंकि अगर सरकार कानून पर किसी तरह की रोक लगाती है तो फिर किसान बातचीत ही नहीं करेंगे।

इसके जवाब में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हम कानून पर रोक लगाने की बात नहीं कर रहे। आप ये कर सकते हैं कि दोनों पक्ष जब तक बातचीत कर रहे हैं तब तक कानून को लागू न करने का भरोसा दिलाया जाए। गुरुवार को हुई सुनवाई में किसानों के संगठन की तरफ से कोई भी प्रतिनिधि नहीं आया था। कोर्ट को बताया गया कि किसी भी संगठन ने नोटिस स्वीकार करने से मना कर दिया।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा पास किए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में कई दिनों से किसानों का प्रदर्शन जारी है। हालांकि इस बीच किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकल सका है।

तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के प्रदर्शन को हटाने संबंधी याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि हम आज कानूनों की वैधता पर कोई निर्णय नहीं लेंगे, हम केवल विरोध के अधिकार और देश में कहीं भी मुक्त आवाजाही के अधिकार पर निर्णय लेंगे। इसके साथ पीठ ने कहा कि अगर किसान और सरकार वार्ता करें तो विरोध-प्रदर्शन का उद्देश्य पूरा हो सकता है और हम इसकी व्यवस्था कराना चाहते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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